उधार की एक सुबह
नौकरी से उधार माँगी हुई एक सुबह में, एक उधार की बालकनी पर बैठा हूँ।
कुछ ख़ास नहीं कर रहा।
थोड़ी-बहुत बातें कर रहा हूँ तुम्हारे साथ। गिलहरियों का चहचहाना सुन रहा हूँ। परिंदे भी हैं, मगर आज गिलहरियाँ ज़्यादा बातूनी निकली हैं।
कुछ ख़्वाबों को सुबह की सैर पर भेज दिया है। कुछ लौट आएँगे, कुछ शायद रास्ता भूल जाएँगे।
बीच-बीच में हम दोनों देर तक चुप भी रहते हैं। इतनी देर कि चुप्पी भी बातचीत का हिस्सा लगने लगती है।
ऐसी ही एक सुबह याद आती है। बहुत पुरानी। जब तुम्हारे साथ बैठकर बस चाय पी थी।
सोच रहा हूँ, ज़िंदगी के आख़िरी बरसों में मुझे क्या याद रहेगा? कौन-सी मीटिंग, कौन-सी फ़ाइल, कौन-सा सोमवार?
या फिर ऐसी कोई सुबह।
एक उधार की बालकनी। बारिश से धुली-धुली सी धूप। गिलहरियों की आवाज़। और तुम्हारा साथ।
तुम्हारे साथ बिताई हुई कुछ सुबहें अंटी में खोंस के रखने का मन करता है।
ज़िंदगी की शाम में बैठकर उन्हें खर्च करने का इरादा है।